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Short Hindi Story | लेखिका सुलेखा देवी - Jaruribaten.com

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Short Hindi Story | लेखिका सुलेखा देवी -


"प्रज्ञा के लिए जोरदार तालियां बज रही थी,,    

मंच पर खड़े सभी लोगों ने प्रज्ञा को बुलाते हुए कहा अब हमारे बीच 27 वर्ष की सुप्रसिद्ध लेखिका जिन्हें देश-विदेश में ख्याति प्राप्त हुई है जिनकी अब तक 25 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है आज भारत के राष्ट्रपति अपने हाथों से प्रज्ञा को सम्मानित और पुरस्कार से अभिभूत करेंगे। प्रज्ञा से अनुरोध है इस मंच पर आकर इस मंच की शोभा बढ़ाएं और अपने बारे में  दो शब्द कहे - प्रज्ञा मंच पर आई माईक हाथ में लिया और उसने अपने बारे में बताया

जब मैं बहुत छोटी थी तब मेरी मां "सुलेखा देवी" को मैं हमेशा किताबों में उलझे हुए देखा करती थी घर के कामों को निपटा कर दोपहर को किताबों के पन्ने पलटती कभी-कभी मुझे भी अपने पास बिठा लेती और कुछ अच्छी सी मीठी सी कहानियां सुनाने लगती शाम को पिता दफ्तर से घर आते तो हमेशा ही मां को डांट देते जब देखो, किताबों को लिए बैठी रहती हो प्रज्ञा पर तो ध्यान दिया करो अभी 7 वर्ष की ही है, देखो उसने कपड़े कितने मैले पहने हुए हैं

मां झट किताब को बंद करके अलमारी में रख देती और कहती क्यों खफा हो रहे हो, हाथ मुंह धो लीजिए मैं खाना परोस देती हूं

लेकिन कभी-कभी पापा शाम को ड्यूटी से आने के बाद मां के हाथों से किताब छीन लेते और एक कोने में फेंक देते मां फिर पापा के सामने कभी भी किताब नहीं पढ़ती थी चोरी-छिपे ही किताबों को पढ़ती, एक दिन मां ने एक कहानी लिखी उस कहानी को मुझे भी सुनाया मुझे बहुत अच्छी लगी लेकिन मां ने कहा। प्रज्ञा सुन पापा को पता नहीं चलना चाहिए कि मैंने कोई कहानी लिखी है, वरना तेरे पापा नाराज हो जाएंगे कहेंगे पढ़ते-पढ़ते तेरी आंखें कमजोर हो रही है फालतू के काम करती रहती है

दादी भी हमेशा अपनी पड़ोसन से कहती मेरी बहू सुलेखा जब से इस घर में आई है पति की सारी कमाई किताबों में ही लगा देती है किताबों का ढेर लगा रखा है, मां चुपचाप सुन लेती किसी से कुछ ना कहती अपने गम एक डायरी में लिख लेती पड़ोस में और रिश्तेदारों में यह बात पता नहीं थी कि मेरी मां ने एक कहानी भी लिखी है मां ने उस कहानी को अखबार में या किसी मासिक पत्रिका में छपवाने के लिए कई बार सोचा, किंतु असफल रही घर के कामों से फुर्सत ही नहीं मिलती थी पड़ोस और रिश्तेदारों में बताने में झिझकती थी धीरे-धीरे मां बूढ़ी होती जा रही थी और मैं जवान होती जा रही थी इसी बीच दादी जी का भी देहांत हो गया दादा जी को तो कभी मैंने देखा ही नहीं था एक बार पिताजी ने मां को खूब डांटते हुए कहा तू पागल हो गई है ना जाने क्या-क्या लिखती रहती है ना कहीं घूमने जाती है, जब देखो कहानी ,कहानी ,कहानी एक बार तो पापा ने सारी किताबें उठाकर छत के ऊपर फेंक दी

उस दिन मां बहुत रोई उन्होंने खाना भी नहीं खाया मैं उन दिनों विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी कर चुकी थी मां को मैंने बताया विश्वविद्यालय में मुझे एक प्रोफेसर मिले थे उन्होंने अनगिनत इंग्लिश में किताबें लिखी हैं उन्हें हिंदी लेखिका की तलाश है तुम उन्हीं प्रोफेसर के साथ काम कर लो तुम्हारा लिखने का शौक भी पूरा हो जाएगा तब मां कहने लगी अब मेरी उम्र हो चुकी है, मैं कहानियां लिखती रहूंगी तू मेरी कहानियों पर अपना नाम दे दिया कर अगले दिन मैंने प्रोपेसर को अपनी मां की सारी बात बता दी प्रोफेसर जी बोले, देखो बेटी प्रज्ञा तुम अपनी मां की लिखी हुई कहानी ले आओ पुस्तक के कवर पर तुम्हारी मां का नाम ही छपवाऊंगा किताब छपने के बाद तुम पुस्तक अपनी मां को तोहफे के रुप में पेश करना तब तुम्हारी मां कितनी खुश होगी 15 दिन के बाद किताब के ऊपर लिखा था लेखिका सुलेखा देवी

आज मैं बहुत खुश थी मैं दौड़ी दौड़ी किताब हाथ में लिए घर पहुंची बाहर लोगों की भीड़ लगी थी घर के अंदर दाखिल हुई तो देखा मां बिस्तर पर लेटी हुई थी मां का चेहरा चादर से ढका हुआ था पड़ोसन ने बताया तेरी मां को अचानक कपकपी चढ़ी और सांस छूट गई अब तेरी मां सुलेखा देवी इस दुनिया में नहीं रही, मैंने हाथ में पकड़ी किताब मां के चरणों में रख दी और कसम खाई मां तुम्हारा सपना मैं पूरा करूंगी कुछ दिनों के बाद मैं प्रोफेसर साहब के पास जाकर मिली, मैंने लिखना आरंभ किया और एक के बाद एक किताबें मार्केट में प्रकाशित होने लगी, यही है मेरी लेखिका बनने की एक छोटी सी कहानी-

मंच पर खड़े सभी लोगों की आंखों में आंसू थे राष्ट्रपति ने प्रज्ञा को पुरस्कार से सम्मानित किया कुर्सियों पर बैठे सभी लोग जोरदार तालियों से प्रज्ञा की मां सुलेखा देवी और प्रज्ञा की बहादुरी के लिए खड़े होकर अभिनंदन करने लगे

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