हिंदी मौलिक कहानी - दर्पण
वैष्णवी चाय लेकर आई। अशोक वैष्णवी को देख चाय का कप पकड़ते हुए कुछ सोचने लगे। वैष्णवी ने कहा, "क्या हुआ पापा? क्या सोच रहे हो?"
अशोक ने कहा, "कुछ नहीं बेटा तुझमें तेरी मां को देख रहा हूं, आज अचानक ऐसा लगा, तुझे देख कर जैसे तेरी मां खड़ी है!"
अशोक चाय की चुस्कियां लेते हुए सोचने लगे, "आज से तीस वर्ष पूर्व, जब वैष्णवी पैदा हुई थी, तो उनको झटका सा लगा,...लगातार दो बेटियां हो चुकीं थीं, उन्हें बेटे की चाहत थी। ढेर सारी मन्नतों के बाद एक बेटा हुआ शेखर।
अशोक ने दोनों बच्चियों को सरकारी स्कूल में डाल दिया था और शेखर का अच्छे स्कूल में दाखिला करवाया था। वैष्णवी होशियार थी पढ़ने में।
एक बार स्कूल में किसी लेखन प्रतियोगिता में हिस्सा लेना था। उसके लिए उसे कुछ पैसे जमा करने थे, पर अशोक ने देने से इंकार कर दिया और उसी जगह शेखर को उन्होंने पैसे दे दिये उसे किताब लेना था। तब वैष्णवी खूब रोई थी। तो उसकी मां ने उसे चुपके से पैसे दिए ताकि वो प्रतियोगिता में हिस्सा ले सकें। वैष्णवी आगे और पढ़ना चाहती थी, पर अशोक ने सहयोग करने से इंकार कर दिया।
तब तक उसकी बड़ी बहन की शादी हो चुकी थी। वैष्णवी लड़ झगड़ कर अपनी बड़ी बहन के यहां चली गई। वहां से प्राइवेट जॉब ज्वाइन कर ली और पढ़ाई भी करते रही।
वैष्णवी का इस तरह से नाराज़ होकर चले जाना अशोक को पसंद नहीं आया। पर वैष्णवी भी ज़िद्दी थी। शेखर से अशोक को बहुत उम्मीदें थी। पर शेखर अपनी पढ़ाई पूरी कर विदेश चला गया और वहीं बस गया। तब तक अशोक की पत्नी भी गुजर चुकी थी।
वैष्णवी अपने पिता को अकेला कैसे छोड़ देती, आज ऊंचे पद पर सरकारी कार्यालय में कार्यरत थी वैष्णवी। अशोक की तबीयत अचानक खराब हुई….तो वैष्णवी पिता के पास वापस लौट आई थी…अभी तक उसने शादी के विषय में कुछ सोचा भी नहीं था। आज दर्पण की तरह अशोक के सामने खड़ी थी वैष्णवी। तभी वैष्णवी की आवाज सुनकर अशोक की तंद्रा भंग हुई।
वैष्णवी ने कहा, "पापा मैं ऑफिस जा रही हूं ! आज दीदी भी आने वाली है, एक-दो घंटे में आ जाएगी वो आपका ध्यान रखेंगी, अच्छा चलती हूं पापा, फिर शाम को मिलूंगी ! अशोक वैष्णवी को देखकर सुकून महसूस कर रहे थें।
रचना- अनामिका मिश्रा (झारखंड जमशेदपुर)

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