हिन्दी कविता - हाथी दादा
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सूट पहनकर हाथी दादा
चौराहे पर आये
रिक्शा एक इशारा करके
वे तुरंत रूकवाए
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चला रही थी हांफ-हांफ कर
रिक्शा एक गिलहरी
बोले हाथी दादा मैडम
ले चल मुझे कचहरी
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तब तरेर कर आँखे वह
हाथी दादा से बोली
लाज नही आती है तुमको
करते हुए ठिठोली
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अपना रिक्शा करूँ कबाड़ा
तुमको यदि बैठा लूं
जान बूझकर क्यों साहब
मैं व्यर्थ मुसीबत पालू
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माफ करो गुस्ताखी मिस्टर
कोई ट्रक रुकवाओ
तब तुम उसपर बड़े ठाठ से
बैठ कचहरी जाओ
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