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Hindi Poem | हाथी दादा


हिन्दी कविता - हाथी दादा  

***

सूट पहनकर हाथी दादा

चौराहे पर आये

रिक्शा एक इशारा करके

वे तुरंत रूकवाए

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चला रही थी हांफ-हांफ कर

रिक्शा एक गिलहरी

बोले हाथी दादा मैडम

ले चल मुझे कचहरी

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तब तरेर कर आँखे वह

हाथी दादा से बोली

लाज नही आती है तुमको

करते हुए ठिठोली

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अपना रिक्शा करूँ कबाड़ा

तुमको यदि बैठा लूं

जान बूझकर क्यों साहब

मैं व्यर्थ मुसीबत पालू

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माफ करो गुस्ताखी मिस्टर

कोई ट्रक रुकवाओ

तब तुम उसपर बड़े ठाठ से

बैठ कचहरी जाओ

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