अक्सर हमारे माता पिता, गुरु और बड़े बुजुर्ग हमें अच्छे और बुरे कार्यों के बारे में बताते रहते है जिससे की आगे चलकर हम समाज और परिवार के लिए उपयोगी हो सके
हमारे देश भारत में जब तक गुरुकुलों में शिक्षा दीक्षा दी जाती थी तब तक तो बच्चों के शैक्षणिक विकास के साथ -2 उनके अन्दर नैतिक और सामाजिक विकास पर भी जोर दिया जाता था लेकिन तदन्तर समय के साथ ही शिक्षा के आधुनिकीकरण में अब केवल विषय से संबंधित चीजो पर ध्यान दिया जाता है इससे रोजगार के सुअवसर तो बने है युवाओं के लिए लेकिन साथ ही उनमे अनीति, लोभ, दुराचार और ऐसे न जाने कितने अवगुनों का भी प्रादुर्भाव हुआ है खैर हमारा विषय है पाप और पुण्य का तो यदि हम पाप और पुण्य की व्याख्या करे तो " हमारे द्वारा किया गया कोई भी ऐसा कृत्य, जिससे किसी भी प्राणी को शारीरिक या मानसिक कष्ट की अनुभूति हो, उसे पाप की श्रेणी मे रखा जा सकता है "
ठीक इसी प्रकार " हमारे द्वारा निःस्वार्थ भाव से किये गए ऐसे कार्य को, जिसके करने का उत्तरदायित्व हमारे ऊपर ना हो तथा जो प्राणिमात्र को सुखानुभूति कराये, उसे पुण्य की संज्ञा दी जा सकती है "
जैसा की भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि " पाप और पुण्य शाश्वत नहीं अपितु परिवर्तनशील हैं काल, परिस्थिति एवं स्थानिक विविधता के आधार पर पाप और पुण्य की परिभाषा परिवर्तित होती रहती है "
परिस्थिति के अनुसार पाप, पुण्य का और पुण्य, पाप का रूप धारण कर लेता है यह तो सर्वविदित है " श्रीराम द्वारा बालि को छल से मारा जाना पाप नहीं वरन पुण्य था किन्तु राजा शिवि द्वारा बाज का ग्रास बनते कबूतर को बचाया जाना पाप होता यदि उन्होंने कबूतर के बराबर अपना मांस बाज को उसकी भूख मिटाने के लिए ना दिया होता "
पाप और पुण्य बहुत हद तक हमारी मान्यताओं पर भी निर्भर करता है जैसे जीवहत्या पाप है किन्तु बकरीद के दिन बकरे की बलि पुण्य मानी जाती है कुछ समुदाय के लोगों में
इसी प्रकार पाप और पुण्य व्यक्तिगत या सामूहिक अथवा राष्ट्रीय आवश्यकताओ एवं स्वार्थों पर भी निर्भर करते हैं यथा युद्ध के समय मातृभूमि की रक्षा हेतु शत्रु सैनिकों का संहार करना परम पुण्य का कार्य है
उपर्युक्त तथ्य से यही स्पष्ट होता है कि पाप और पुण्य की कल्पना हमने अपनी आवश्यकताओं एवं स्वार्थों की पूर्ति के लिए की है जो हमारे लिए पाप है वह औरों के लिए पुण्य हो सकता है और जो हमारे लिए पुण्य है वह दूसरों के लिए पाप हो सकता है कल तक जो पाप था वह आज पुण्य हो सकता है और आज जो पुण्य है वह कल पाप हो सकता है सब समय का खेल है
वास्तव में पाप और पुण्य कुछ है ही नहीं, यह मात्र हमारी आवश्यकताओ एवंं स्वार्थों की पूर्ति का साधन मात्र है हालाँकि इसके पीछे नैतिकता एवं मानव अस्तित्व को बनाये रखने की एक अवधारणा अवश्य काम करती है क्योंकि यदि पाप और पुण्य होता तो उसे सबके लिए समान होना चाहिए जो हमारे लिए पाप है उसे सबके लिए पाप होना चाहिए यही बात पुण्य पर भी लागू होती है किन्तु हम देखते हें कि एक सैनिक द्वारा शत्रु सैनिक को मारना मातृभूमि की रक्षा के नाम पर किया गया पुनीत कार्य है जबकि मृत सैनिक के परिवार या देश वालों की दृष्टि में मारने वाला सैनिक हत्यारा व घोर पापी है यहाँ एक ही घटना एक के लिए पुण्य तथा दुसरे के लिए पाप है पाप और पुण्य की यह परिवर्तनशीलता व पक्षपात पाप और पुण्य के अस्तित्व को संदेह के घेरे में ला खड़ा करती है-

2 टिप्पणियाँ
हमे आपका 'पाप और पुण्य' ब्लॉग काफी अच्छा लगा आप ऐसे ही लिखा करो हमे कुछ अच्छी शिक्षा प्राप्त होती है
जवाब देंहटाएंNice post
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